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Wednesday, 25 July 2018

GURU KA STHAN - एक MORAL STORY

GURU KA STHAN - एक  MORAL STORY


इस लेख मे हमने Reader के लिएGURU KA STHAN को एक MORAL STORY के रूप मे  दिए है, पिछले लेख मे हमने reader के लिए 

 ईश्वर का भेजा फ़रिश्ता यह लेख पब्लिश किया था, आशा करते है की उसी तरह आपको यह भी लेख पसंद आएगा !


Gyanireader..संपूर्ण ज्ञान का एक उत्तम संगम मैं आप सब का तहे दिल से स्वागत है ! आज हम Gyanireader की तरफ से आप सबके लिए एक एसे सकसियत के बारे मे बात करने जा रहे है जिसकी जितनी तारीफ़ की जाए उतनी ही कम है ! आज हम जो भी है उन्ही की बदोलत है जिसे हमारे धर्मो मे भगवान से  भी ऊपर का स्थान दिया गया है !

तो चलिए मित्रो जानते है एक छोटी सी कहानी से की आखिर क्यों “गुरु जी” का स्थान सर्वोपरी है ! 


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TEACHERS DAY, MORAL STORY

एक राजा था, उसे पढने लिखने का बहुत शौक था इसलिए उसने एक बार मंत्री परिषद के माध्यम से अपने लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की ! शिक्षक राजा को पढ़ाने के लिए आने लगे ! राजा को शिक्षा ग्रहण करते कई महीने बीत गए, मगर राजा को कोई लाभ नहीं हुआ या यु कहे कोई शिक्षा प्राप्त नहीं हुई ! इसमें गुरु की कोई कमी नहीं थी वे तो रोज खूब मेहनत करते थे लेकिन उनके इतने प्रयास के बावजूद भी राजा को कोई फायदा नहीं हो रहा था ! अब राजा काफी परेशान होते जा रहा था क्योंकि राजा ये समझता था की गुरु की प्रतिभा और योग्यता पर सवाल उठाना गलत है, क्योंकि वो एक बहुत प्रसिद्ध और योग्य गुरु थे ! आखिर कार एक दिन राजा को काफी परेशान देख कर रानी ने उनसे उनके परेशानी का कारण पूछा और सलाह दि की राजन आप इस सवाल का जवाब गुरु जि से ही पूछ कर देखिये सायद इस परेशानी का जवाब गुरु जी के पास हो !



रानी की बातो को को सुन कर राजा ने एक दिन बहुत हिम्मत कर के गुरूजी के सामने अपनी जिज्ञासा राखी “हे गुरुवर, क्षमा करियेगा, मे कई महीनो से आपसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हु परन्तु मुझे इसका कोई लाभ नहीं हो रहा है एसा क्यों है ? गुरुवर कृपा आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करिए !”


गुरु जी ने बड़े ही शांत स्वर मे जवाब दिया, “राजन इसका कारण बहुत ही सीधा सा है..” इतना सुनते ही राजा से ना रहा गया उसने सोचा जिस के जिए मे इतने दिनों से परेशान था उसका इतना सीधा जवाब क्या हो सकता है इसलिए राजा ने गुरु से विनती करते हुए कहा “हे गुरुवार कृपा करके आप शीघ्र इस प्रश्न का उत्तर दीजिये !”


गुरु ने कहा, “ राजन बात बहुत छोटी है परन्तु आप अपने बड़े होने के अहंकार के कारण इसे समझ नहीं पा रहे है और इस वजह से आप परेशान और दुखी है ! गुरु ने फिर कहा माना की आप एक बहुत बड़े राजा है, आप हर दृष्टी से मुझ से पद और प्रतिष्ठा मे बड़े है, परन्तु यहाँ पर आप का और मेरा रिश्ता एक गुरु और शिष्य का है ! मे आप का गुरु होने के नाते मेरा स्थान आप से उच्च होना चाहिए, परन्तु आप स्वय ऊचें सिहांसन पर बैठते है, और मुझे अपने से नीचे के आसन पर बैठाते है ! बस यही एक कारण है जिससे आपको न तो कोई शिक्षा प्राप्त हो रही है और नहीं कोई ज्ञान मिल रहा है ! आप के राजा होने के कारण मे यह बात आप से कह नहीं पा रहा था !


कल से अगर आप मुझे ऊचें आसन पर बैठाए और स्वय निचे बैठे तो कोई कारण नहीं की आप शिक्षा प्राप्त न कर पाए !


अब जाकर राजा की समझ मे सारी बात आ गई और उसने तुरंत अपनी गलती को स्वीकारा और गुरुवर से उच्च शिक्षा प्राप्त की !


दोस्तों आप तो ये समझ ही गए होंगे स्थान बदलने से राजा ने उच्च शिक्षा कैसे प्राप्त की, अगर नहीं तो आप लोगो ने ये तो जरुर ही सुना होगा की....
शिक्षक एक मोमबती की तरह होता है जो स्वम जलकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है ! शायद इसलिए मित्रो गुरु का स्थान भगवान् से भी ऊपर है ! आप या हम चाहे जिंदगी की किसी भी मुकाम पर चाहे वह बड़ा हो या छोटा क्यों ना हो कभी भी किसी गुरु का अपमान नहीं करना उन्हें हमेशा पूर्ण सामान देना ! क्योंकि आज हम जो कुछ भी है सब उनके ही दिए हुवे ज्ञान की वजह से मुमकिन है !


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आशा करता हूं दोस्तों आप सब को हमारा यह पाठ जरूर पसंद आया होगा और ऐसे ही रोचक और ज्ञान की बातों के बारे में जानने के लिए आप सब बने रहिए अपने ही Gyanireader..“संपूर्ण ज्ञान का एक उत्तम संगमके साथ !


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                                                                                             ‘धन्यवाद’..!

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