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Sunday, 24 February 2019

Indus Water Treaty.. सिंधु जल संधि के पीछे की कहानी..|

इस लेख मे हमने Reader के लिए  Indus Water Treaty.  सिंधु जल संधि..| पर अहम जानकारी साझा कर रहे है, तथा यह आशा करते है की  reader के लिए Indus Water Treaty सिंधु जल संधि  पर साझा की गई जानकारी जरुर पसंद आएगी !

सिंधु जल संधि के पीछे की कहानी


Indus Water Treaty

1 सिंधु जल संधि क्या है ?

2 इतिहास और पृष्ठभूमि

3 विश्व बैंक की भागीदारी

4 समझौते मे क्या है ?

5 विवाद के विषय

6 क्या सिंधु जल संधि तोड़ी जा सकती है ?

7 इसका भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

1. सिंधु जल संधि क्या है ?
सिंधु जल संधि को दो देशो के बीच जल विवाद पर एक सफल अंतराष्ट्रीय उदाहरण बताया जाता है |

सिंधु जल संधि यह पानी के वितरण के लिए 56 साल पहले विश्व बैंक की मध्यस्थता मे भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान द्वारा इस संधि पर हस्ताक्षर किये गए थे | इस संधि के प्रावधानों के अनुसार भारत सिंधु नदी के पानी का केवल 20 प्रतिशत तक का ही उपयोग कर सकता है |


2. इतिहास और पृष्ठभूमि
ब्रिटिश राज के समय ही दक्षिण पंजाब मे सिंधु नदी घाटी पर बड़े नहर का निर्माण कराया गया था | जिससे  उस इलाके को इसका इतना लाभ मिला कि बाद में वो दक्षिण एशिया का एक प्रमुख कृषि क्षेत्र बन गया था | लेकिन भारत और पाकिस्तान के बटवारे के दौरान जब पंजाब को विभाजित किया गया तो इसके पूर्वी भाग भारत और पश्चिमी भाग पाकिस्तान के हिस्से मे चला गया | इसी दौरान सिंधु नदी घाटी और इसके विशाल नहरों एवं सहायक नदियों को भी विभाजित किया गया | जिसके फलस्वरूप इन नदियों से मिलने वाले पानी के लिए पाकिस्तान पूरी तरह भारत पर निर्भर था |
पानी के बहाव को बनाए रखने के उद्देश्य से पूर्व और पश्चिम पंजाब के चीफ़ इंजीनियरों के बीच 20 दिसंबर 1947 को एक समझौता हुआ | इस समझौते के तहत भारत को बंटवारे से पहले तय किया गया पानी का निश्चित हिस्सा 31 मार्च 1948 तक पाकिस्तान को देते रहना होगा यह तय हुआ | लेकिन जब अप्रैल 1948 को समझौता लागू नहीं रहा तो भारत ने दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया जिससे पाकिस्तानी पंजाब की 17 लाख एकड़ ज़मीन पर हालात ख़राब हो गए | भारत के इस कदम के कई कारण बताए गए जिसमें से एक प्रमुख था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहता था, हालाकि बाद में हुए समझौते के बाद भारत पानी की आपूर्ति जारी रखने पर राज़ी हो गया |


बता दे कि सिंधु नदी का इलाका तक़रीबन 11.2 लाख किलोमीटर क्षेत्र मे फैला हुआ है जो भारत मे 39%, पकिस्तान मे 47%, चीन मे 8% तथा अफगानिस्तान मे 6% हिस्सों मे फैला हुआ है | इसके अलावा वर्तमान मे एक आकड़े के मुताबिक़ करीब 30 करोड़ लोग सिंधु नदी के आस-पास के इलाको मे रहते है |
 3. विश्व बैंक की भागीदारी
प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने 1951 मे  टेनसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलियंथल को भारत बुलाया लिलियंथल पाकिस्तान भी गए और वापस अमरीका लौटकर उन्होंने सिंधु नदी घाटी के बंटवारे पर एक लेख लिखा |
ये लेख विश्व बैंक प्रमुख और लिलियंथल के दोस्त डेविड ब्लैक ने भी पढ़ा, जिसके बाद डेविड ब्लैक ने भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया और फिर जाकर शुरू हुआ दोनो पक्षों के बीच बैठकों का सिलसिला | बैठको का ये सिलसिला तकरीबन एक दशक तक चला, और फिर जाकर विश्व बैंक की मध्यस्थता से आखिरकार 19 सितंबर 1960 को दोनों देशो के बीच कराची में सिंधु नदी घाटी समझौते पर हस्ताक्षर हुए |

4. समझौते मे क्या है ?
यह पहली ऐसी जल संधि है जिसमे विश्व बैंक ने मध्यस्थता की है | सिंधु जल संधि समझौते के अंतर्गत सिंधु की सहायक नदियो को पूर्वी और पश्चिमी नदियों मे विभाजित किया गया | सतलज, व्यास और रावी नदियों को पूर्वी नदी बताया गया जब की झेलम, चेनाब, और सिंधु को पश्चिमी नदी बताया गया |

समझौते के मुताबिक पूर्वी नदियों का पानी (सतलज, व्यास और रावी) कुछ अपवादों को छोड़ दे तो भारत बिना रोक टोक के इस्तेमाल कर सकता है | जबकि पश्चिमी नदियों (सिंधु, चेनाब और झेलम) का पानी पकिस्तान के लिए होगा |

संधि के प्रावधानों के अनुसार बिजली बनाना तथा  कृषि के लिए सिमित पानी अर्थात भारत सिंधु नदी के केवल 20 प्रतिशत तक पानी का उपयोग कर सकता है
इस समझौते के अंतर्गत एक स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना भी की गई, जिसमे किसी भी समस्या पर दोनों देशो के कमिश्नरो को मिलकर समस्या पर बात करने का प्रस्ताव था | अगर आयोग समस्या का हल नहीं दूंढ पाती है तो सरकारे उसे सुलझाने की कोशिश करेगी | इसके अलावा समझौते मे विवादों का हल दूंढने के लिए तटस्थ विशेषज्ञ की मदद लेने तथा कोर्ट ऑफ़ ऑर्बिट्रेशन मे जाने का भी रास्ता सुझाया गया है |

5. विवाद के विषय
सिंधु जल संधि पर काफी लंबे समय से भारत और पकिस्तान के बीच विवाद जारी है  तथा इसके लिए कई बैठकों का दौर भी चल चूका है दरअसल भारत 1960 मे ये सोचकर पाकिस्तान से संधि पर हस्ताक्षर किया की उसे जल के बदले शांति मिलेगी लेकिन संधि के अमल मे आने के पांच साल बाद ही पकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर 1965 मे हमला कर दिया  तथा तब से पकिस्तान आतंकवाद और सेना दोनों का इस्तेमाल भारत के विरूध्द कर रहा है |

दोनों देशो के बीच दो युध्दों और एक सिमित युध्द कारगिल और हजारो दिक्कतों के बावजूद ये संधि कायम है, विरोध के स्वर उठते रहे लेकिन संधि पर असर नहीं पड़ा | लेकिन पकिस्तान का आतंकवाद को लेकर जिस तरह का रवैया रहा है तथा वर्तमान मे अब भी है उसकी वजह से किसी भी समय यह संधि ख़त्म हो सकता है | क्योंकि जिस प्रकार यह नदियाँ भारत का हिस्सा है तो स्वभाविक रूप से भारत इस समझौते को तोड़ सकता है |

इसके अलावा पकिस्तान भारत की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओ जैसे पाकल (1,000 मेगावाट), रातेल (850 मेगावाट), किशनगंगा (330 मेगावाट) मियार (120 मेगावाट) और लोअर कलनाई (48 मेगावाट) पर आपत्ति उठता रहा है |

तो वही पकिस्तान मे भारत के पूर्व राजदूत जि पार्थसारथी कहते है जम्मू-कश्मीर मे भारत को हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर की जरुरत को पूरा करने के लिए पानी की आवश्यकता है किन्तु संधि को तोड़ना ये विवादास्पर्श है | परिणामस्वरूप कश्मीर अपने जलसंसाधनो का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है, तो वही भारत के कश्मीर मे वहा के जलसंसाधनो का राज्य को लाभ नहीं मिलने की बात भी कही जाती रही है |

इसके अलावा जब तुलबुल प्रोजेक्ट कश्मीर मे बनाने की बात आई तो पाकिस्तान ने इस पर भी आपत्ति जताई हालांकि तुलबुल प्रोजेक्ट मे बारिश के दौरान पानी रोकने की बात की गई थी, जो समझौते के अनुसार नहीं किया जा सकता था क्योंकि समझौते मे ये लिखा गया था की पानी का इस्तेमाल इस तरह से कर सकते थे की उसकी धरा बहती रहे |

पंकज मंडोठिया ने समझौते और दोनों देशों के बीच के तनाव को ध्यान मे रख कर इस समझौते के टूटने की बात कही है क्योंकि जो परिस्थिति 1960 मे थी वो अब नहीं रही है, वर्तमान परिस्थिति इतनी तनावपूर्ण है की समझौता रद्द हो सकता है |

6. क्या सिंधु जल संधि तोड़ी जा सकती है ?
मौजूदा हालात मे पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए जिस तरह से सिंधु के पानी को रोकने की बात की जा रही है वह कहने को तो मुमकिन है, लेकिन व्यवहारिक कठिनाईया और उनके नतीजे भारत के पक्ष मे भी नहीं जाते | हालाकि भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ़ ट्रीटीज़ की धारा 62 के अंतर्गत यह कह कर पीछे हट सकता हैकि पाकिस्तान चरमपंथी (आतंकी) गुटों का उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहा है | जिसके उपरांत अंतराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है|"
तो वही भारत के पूर्व विदेश सचिव रह चुके मुचकुंद दुबे का कहना है की संधि को रद्द करके पकिस्तान को मिले उसके अधिकार से वंचित करने से बहुत बड़ा मतभेद हो सकता है | ऐसा इसलिए क्योंकि बटवारे के बाद सिंधु घाटी से गुजरने वाली नदियों पर नियंत्रण को लेकर उपजे विवाद की मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी | लिहाजा यदि भारत यह समझौता तोड़ता है तो पाकिस्तान सबसे पहले विश्व बैंक के पास जाएगा और विश्व बैंक भारत पर ऐसा ना करने के लिए दबाव बनाएगा विदेश नीति के लिहाज से यह विश्व बैंक और इसके सदस्य देशो के साथ सबंध खराब करने जैसा होगा |
इसके अलावा कई विशेषज्ञों का कहना है की यह एक अंतराष्ट्रीय संधि है, ऐसे मे भारत इसे अकेले ख़त्म नहीं कर सकता अगर ऐसा हुआ तो इससे भारत को अंतराष्ट्रीय आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा | साथ ही यह संदेश भी साफ़ जाएगा की हम कानूनी रूप से लागू संधि का उल्लघंन कर रहे है |
वही इस संधि के उपलक्ष्य मे सिंधु नदी घाटी संधि पर 1993 से 2011 तक पाकिस्तान के कमिश्नर रहे चुके जमात अली शाह ने बताया कि समझौते के मुताबिक़ कोई भी एक तरफा तौर पर इस संधि को नहीं तोड़ सकता है या बदल सकता हैइसके लिए भारत पाकिस्तान को साथ मिलकर ही इस संधि मे बदलाव करना होगा या एक नया समझौता बनाना होगा

7. इसका भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

सिंधु जल संधि तौड़ने से अगर पाकिस्तान को घाटा हो रहा है, तो दूसरी तरफ से भारत को भी इसका त्वरित तौर पर बहुत ज्यादा फायदा होता नहीं दिख रहा है तथा यह कहना भी गलत नहीं होगा की इन नदियों के बीच पानी का मानो समंदर है जिसे रोक पाना कोई आसान काम नहीं, इसके लिए भारत को बांध और कई नहरे बनानी होंगे, जिसके लिए बहुत पैसे और वक्त की जरुरत होगी, इसके साथ इसके विस्थापन की समस्या का सामना भी करना पड़ सकता है तथा इसके अलावा इसके पर्यावरणीय प्रभाव भी अलग से होगे | इसके साथ ही वैश्विक मंच पर भी भारत की जग हँसाई अलग से होगी, अर्थात भारत की अंतराष्ट्रीय छवि पर भी धब्बा लगेगा | ऐसा इसलिए क्योंकि अब तक भारत ने इस इंटरनेश्नल ट्रीटी का कभी भी उल्लंघन नहीं किया |
अगर भारत अब पानी रोकता है तो पाकिस्तान को हर मंच पर भारत के खिलाफ बोलने का एक मौका मिलेगा और वह इसे मानवाधिकारों से जोड़ेगा इसके अलावा चीन से कई नदियाँ भारत मे आती है और आने वाले दिनों मे चीन इसे मुद्दा बनाते हुए मुश्किलें खड़ी कर सकता है तथा पड़ोसी देशों बांग्लादेश और नेपाल के साथ भारत की नदी जल संधिया है जिससे इन पर भी इसका असर पड़ सकता है |

  





आशा करता हूं दोस्तों आप सब को हमारा यह लेख जरूर पसंद आया होगा और ऐसे ही रोचक और ज्ञान की बातों के बारे में जानने के लिए आप सब बने रहिए अपने ही Gyanireader..“संपूर्ण ज्ञान का एक उत्तम संगम” के साथ !



संतोष भारतीय 
  Civil Service Aspirant (UPSC)


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                                                                                             धन्यवाद’..!


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